Sunday, 14 August 2016

Schizophrenia (स्किज़ोफ्रेनिया) - in Hindi

SCHIZOPHRENIA (स्किज़ोफ्रेनिया)
विश्व में स्किज़ोफ्रेनिया लगभग 1% लोगों में पाया जाने वाला रोग है। सामान्यतः यह 25 वर्ष की उम्र से पहले शुरू हो जाता है। यह जीवनपर्यंत चलने वाला रोग होता है और सभी वर्गों के व्यक्तियों को यह रोग हो सकता है। प्रत्येक रोगी में इसके लक्षण रोग का व्यवहार और इलाज का परिणाम अलग-अलग हो सकता है। स्किज़ोफ्रेनिया रोग का निदान (diagnosis) पूर्णतया इसके मेडिकल इतिहास और रोगी के मानसिक परिक्षण पर निर्भर करता है। इस रोग के पहचानने के लिए कोई लैब जांच उपलब्ध नहीं है अपितु सामान्य जांचें समय-समय पर आवश्यकतानुसार कराई जा सकती हैं।
      यह रोग सभी समाज और क्षेत्रों में सामान रूप से पाया जाता है। विभिन्न कारणों से इस रोग से ग्रसित आधे रोगी ही इलाज प्राप्त कर पाते हैं। स्किज़ोफ्रेनिया महिलाओं व पुरुषों में समान रूप से पाया जाता है लेकिन इसकी शुरुआत पुरुषों में जल्दी उम्र में देखी गयी है। स्किज़ोफ्रेनिया रोग की उत्पत्ति अनुवांशिक, मानसिक, और सामाजिक कारकों के मिलेजुले रूप से होता है। सबसे महत्वपूर्ण रसायन dopamine की अधिक सक्रियता के होने को शोधों में पाया गया है अन्य शोधों में अन्य रसायनों, दिमागी कोशिकाओं की संरचना, रक्त का प्रवाह, विध्युत गतिविधियाँ, प्रतिरोधक तंत्र इत्यादि को भी जोड़कर देखा गया है।  
मुख्य नैदानिक लक्षण (diagnostic criteria)
स्किजोफ्रेनिया के निदान के लिए मुख्या लक्षण इस प्रकार से होते हैं:
·         भ्रमित सोच (delusions)
इस तरह की सोच में रोगी अनावश्यक और काल्पनिक डर या शक जाहिर करता है जिसका कोई प्रमाणित आधार नहीं होता है। जैसे कोई उसे मार देगा, उसे नुक्सान पहुंचा देगा पति या पत्नी के चरित्र को लेकर शक, खाने में कुछ मिला देने का शक, मन के विचार पढ़ लिए जाने का शक, माँ में विचार दाल दिए जाने का शक, शारीरिक गतिविधियों के दूसरे के वश में हो जाने का शक, शरीर में चिप (electric chip) लगा दिए जाने का शक, इत्यादि।
·         काल्पनिक आवाजें सुनाई देना (hallucinations)
रोगी को असली लगने वाली आवाजें सुनाई देना जैसे धमकाने की, उससे कार्य करने की, या एक से ज्यादा आवाजें रोगी के बारे में बात कर रही हों। रोगी इनके स्रोत ढूँढने की कोशिश करता है पर मिलती नहीं। घर के अन्य सदस्यों को यह आवाजें नहीं सुनाई देती।
·         समझ में ना आने वाली भाषा का प्रयोग (disorganized speech)
जैसे सवाल का सही जवाब ना देना, बोलते – बोलते विषय से भटक जाना या बीच में नई बात भर देना, इत्यादि।
·         Catatonic Symptoms
लम्बे समय तक जड़मत होकर रहना, अचानक तीव्र उग्रता, मूक होना, धीमी चाल, शरीर में कड़ापन, इत्यादि।
·         ऋणात्मक लक्षण (Negative Symptoms)
चेहरे पर भावनाओं का अभाव, बोल बंद होना, कार्यों में रूचि का ख़त्म होना, कार्यों की शुरुआत न करना और ध्यान केन्द्रित ना कर पाना।

नैदानिक लक्षणों के अलावा कई और लक्षण मिल सकते है जैसे:
      अकेले में बुदबुदाना/बातें करना, हवा में इशारे करना, चेहरे बनाना, कूड़ा इकट्ठा कर लेना, स्वच्छता का स्तर गिरना, बेमौसम के कपड़े पहनना, बिना मकसद कार्य करना/घूमना, इत्यादि।

नैदानिक लक्षणों के आधार पर स्किजोफ्रेनिया मुख्यतः चार प्रकार का होता है :
·         Paranoid
इस प्रकार में delusion और hallucination वाले लक्षणों की बहुतायतता होती है।
·         Disorganized
इस प्रकार में disorganized speech और disorganized behavior बहुतायतता में होता है।
·         Catatonic
इसमें catatonic लक्षण मूल रूप से होते हैं।
·         Undifferentiated
इसमें सभी प्रकार के लक्षण मिले-जुले और समान रूप से पाए जाते हैं।

      इन लक्षणों में से किसी भी लक्षण का स्किजोफ्रेनिया पर विशेषाधिकार नहीं होता है यानि यह अन्य मानसिक रोगों में भी यदा-कदा पाए जा सकते हैं। रोगी के लक्षण और उनकी तीव्रता समय के साथ बदल सकते है। लक्षण का प्रकार रोगी की शिक्षा, बोद्धिक स्तर और सामाजिक परिवेश/मान्यताओं पर भी निर्भर करता है। रोग के चरम स्तर पर होने पर यदा-कदा रोगियों में उग्रता, खुद को या दूसरों को हानि पहुचाने की प्रवृत्ति देखी जा सकती है।
रोग का व्यवहार
शुरू होने के बाद रोग को पूर्ण रूप से विकसित होने में कई महीनों का समय लग सकता है। और इस बीच लक्षण कुछ इस तरह के दिखते हैं जैसे स्कूल/कॉलेज/व्यवसाय से दूर हो जाना/रूचि ना लेना, व्यसन का इस्तेमाल करने लगना, गुमसुम रहें लगना, इत्यादि।
      आगे चलकर इस रोग में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं और हर चढ़ाव के बाद कार्यक्षमता अधिक क्षीण पड़ती जाती है। लम्बी बिमारी होने के बाद अवसाद (depression) के लक्षण भी साथ में हो सकते हैं। एक तिहाई रोगियों में इलाज के माध्यम से लक्षण समाप्त हो जाते हैं परन्तु इलाज तब भी लम्बे समय तक चलता है। एक तिहाई रोगियों में कुछ लक्षण बचे रह जाते हैं फिर भी वे मदद और सहायता से काम-काज कर लेते हैं। और बचे एक तिहाई रोगी मामूली या थोड़ा सा ही इलाज को प्रतिक्रिया देते हैं और अपना जीवन असक्रियता और बार-बार अस्पताल में भर्ती होकर गुज़ार देते हैं।
इलाज
Antipsychotic दवाइयों के सही इस्तेमाल से लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है। Electroconvulsive Therapy का भी काफी अच्छा असर देखा जाता है। रोग के चरम पर होने पर रोगी को अस्पताल में भर्ती किया जा सकता है। उपलब्ध अन्य सामजिक स्रोतों और मदद से इन रोगियों को काफी हद तक जीवन की मुख्यधारा में समाहित किया जा सकता है।


SCHIZOPHRENIA – FACTS AND MYTHS (सच्चाई और मिथ्या), परिवार का दायित्व और कर्तव्य व अन्य जानकारियां

(A)  मिथ्या और सच्चाई

·    मिथ्या - ये लक्षण किसी जादू/टोना/टोटका/ऊपरी का प्रभाव है?

सच्चाई - ये लक्षण क्योंकि शारीरिक रोग के नहीं होते हैं अथवा ये लक्षण व्यवहारिक होते हैं इसलिए ऐसा लगता है कि ये किसी तंत्र-मंत्र या जादू का प्रभाव है। लेकिन सच्चाई को इस तरह से समझा जा सकता है कि हमारा व्यवहार भी हमारे दिमाग की रसायनिक क्रिया-प्रतिक्रिया द्वारा संचालित होता है, इस रसायनिक प्रक्रिया में आया बदलाव व्यवहार में भी परिवर्तन ला सकता है और यह परिवर्तन एक रोग हो सकता है।

·        मिथ्या – रोगी कोशिश करे तो अपनी सोच व व्यवहार बदल सकता है यह रोगी का स्वयं का आलसपन है? 

सच्चाई – क्योंकि यह रोग भी अन्य रोगों की तरह जैविक (biological) कारणों से होता है इसलिए रोगी द्वारा इसे सोच से नहीं बदला जा सकता है। इस रोग के लक्षण दवाई देने से धीरे-धीरे काबू में आते हैं और इलाज ठीक होने के बाद भी लम्बे समय तक चलता है।

·        मिथ्या – यह रोगी हमेशा आक्रामक होते हैं?

सच्चाई – यह रोग के तीव्र होने की स्तिथि में आक्रामक हो सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सभी रोगी हर समय आक्रामक मूड में होते हैं और बिना किसी कारण के वह गुस्सा या हमला कर सकते हैं। सुचारू रूप से इलाज लेने पर रोग जल्दी ही काबू में आ जाता है और आक्रामक लक्षण समाप्त हो जाते हैं और रोगी सामान्य जीवनयापन कर पाता है। शोधों में तुलना करने पर यह पाया गया है कि इन रोगियों की आक्रामकता की तादात नॉर्मल व्यक्तियों की आक्रामकता की तादात से कम होती है।  

·        मिथ्या – इलाज की दवा बस नींद लाने का काम करती हैं?

सच्चाई – ऐसा नहीं है, यह दवाइयाँ रसायनिक बदलाव को ठीक करती हैं। क्योंकि यह दवाइयां दिमाग पर असर करती हैं इसलिए नींद आना इनका साइड इफ़ेक्ट हो सकता है जो नियमित दवाइयाँ लेने पर समय के साथ-साथ ठीक हो जाता है। और लक्षणों पर इन दवाइयों का असर दिखने लगता है। अक्सर नींद न आना रोग का हिस्सा भी होता है ऐसे में यह इफ़ेक्ट मददगार भी होता है।

·        मिथ्या – रोगी का विवाह कर देने से यह रोग सुधर सकता है या ठीक हो जाता है?

सच्चाई – क्योंकि यह रोग जैविक आधार पर उत्पन्न होता है इसलिए अन्य रोगों (जैसे शुगर) की तरह इस रोग का विवाह या शादी से कोई ताल्लुक नहीं है। बल्कि गृहस्थ जीवन के साथ तालमेल न बैठा सकने की स्तिथि में यह सामाजिक तौर पर हानिकारक भी हो सकता है।

·        मिथ्या – रोगी को जीवनपर्यंत अस्पताल में रहना पड़ता है?

सच्चाई – पुराने समय में जब अत्याधुनिक कारगर दवाइयाँ मौजूद नहीं थीं तब ऐसे रोगियों को लम्बे समय तक या जीवनपर्यंत अस्पताल में रहना पड़ता था। परन्तु अब ऐसी दवाइयाँ और इलाज उपलब्ध है जिससे रोगी ठीक होकर समाज में एक सामान्य जीवन जी सकता है। बस उसे उचित समय पर परामर्श और लम्बे समय तक दवाई लेने की आवश्यकता होती है। शोधों में यह भी देखा गया है रोगी को उसके सामाजिक परिवेश में रखकर इलाज किया जाये तो उसकी कार्यक्षमता सकारात्मक तरीके से बढती है।


(B)  परिवार का दायित्व और कर्तव्य

  •     रोगी को सकारात्मक बातों के लिए प्रोत्साहित करना है, लेकिन ज़रुरत से ज्यादा संरक्षण नहीं देना है, जैसे रोजमर्रा के क्रिया-कलापों को और छोटे-छोटे कार्यों को खुद करने देना है।
  • ·  नियमित दवा लेने के लिए प्रोत्साहित करें तथा बिना सलाह के और इच्छानुसार दवा की मात्रा कम या ज्यादा न करें।
  • ·        अपना काम स्वयं करने दें जिससे रोगी का आत्मविश्वास बढ़े। रोगी को उसके सामर्थ्य के हिसाब से काम दें।
  • ·        इलाज नियमित रूप कराएं जिससे रोग के दोबारा उत्पन्न होने की संभावना कम रहे।
  • ·        रोगी की गलतियों पर अपना गुस्सा व चिडचिडापन न दिखाएं बल्कि उस काम को करने का सही तरीका बताएं व उसकी मदद करें।
  • ·        मरीज़ के व्यवहार व उपलब्धि को लेकर उसकी तुलना दूसरों से न करें।
  • ·        दवाइयाँ अपनी निगरानी में ही खाने को दें।
  • ·        रोगी के साथ लगभग वैसा ही व्यवहार करें जैसा रोग होने के पहले करते थे।

    
(C)  स्किज़ोफ्रेनिया के बारे में अन्य बातें

·        शराब या अन्य नशीली दवाइयों के सेवन से बचें।
·        बिना सलाह लिए दवाएं लेना बंद न करें और दवाओं की मात्र में बदलाव न करें।
·        भावनात्मक व पारिवारिक कलह उत्पन्न न होने दें घर का माहौल शांतिप्रिय बनाये रखें व आपस में सामंजस्य बैठाएं।
·        रोगी की क्षमता के परे काम न लें।

·        दवाओं से किसी भी तरह की परेशानी होने पर तुरंत अपने मनोचिकित्सक से मिलें  अथवा मनोचिकित्सक के उपलब्ध न होने पर आपातकाल में अन्य फिज़िशियन या आपातकालीन विभाग में संपर्क करें। 

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